साधारण सा विरोध!

सब कहते हैं मुझसे,
की मैं
तुझसे… डरूं,
तेरी
सजदा करुँ,
तेरे दरबार में,
तेरे सामने,
शीश झुकाए फिरूं!

मैं पूछता हूँ, क्यूँ?
क्या तुझे खुशी तभी मिलेगी,
जब चंदन की आग में घी जलेगी?
जब तेरे चरणों में मेरा सर होगा,
शरीर पे तेरे नाम का चोगा,
तेरे गुण – गान ही मैं गाऊंगा,
क्या तभी तेरा आशीर्वाद पाउँगा?
क्या तेरी इतनी ही शक्ति है?
जो तरसती मेरी भक्ति है?

क्यूँ मैं बैठा रहूँ,
लगाये तुझसे आस,
तेरे चरणों के पास!
की तू आएगा,
मेरे दुखों का निवारण लायेगा,
कुछ ऐसा चमत्कार कर जाएगा,
की मैं, बिना अपने कर्म किए,
सिर्फ़ नाम धर्म का लिए,
पा जाऊंगा सारी मुश्किलों का हल,
और हो जाएगा मेरा जीवन सरल!

क्या तुझको इतना नज़र नही आता है?
की कौन तेरा, कर्मों से, सच्चा ध्याता है?
तू तो सर्वोपरि है, सर्व-ज्ञाता है,
फ़िर क्यूँ, मेरी नज़र में, एक मूढ़ ही तुझे पाता है?
क्या तेरी मूरत को चंदन तिलक लगना ही
तेरी वंदना है?
क्या उस पत्थर को दूध से नहलाना ही
तेरी अर्चना है?

मैं तेरी इस प्रतिमा का,
तेरी झूठी इस गरिमा का,
रचा हुआ है जो ढोंग,
तेरी महिमा का
विरोध करता हूँ!
और इस विरोध के विरोध से
नही डरता हूँ!

 

ये कुछ ऐसे विचार हैं जिनकी उत्पत्ति कई कारणों से हुई … मुझे पूजा अर्चना जैसे रस्म ढकोसले लगते हैं …मैं नास्तिक नही हूँ…ना ही किसी भी प्रकार की बहस की शुरुआत है…ये बस मेरे स्वतंत्र विचार हैं…

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